पितृपक्ष- गया में श्राद्ध के 17 दिन दीवाली की तरह होते है, दो सौ करोड़ का व्यापार होता है इन दिनों में

By 08:48 AM, 26.September 2016 Custom Tag

गया (बिहार) गया के लोगों के लिये वर्ष भर के 17 दिन दीवाली की तरह होते है, इन दिनों आपकों यहां ढूढने से भी कमरा नहीं मिलेगा, यह 17 दिन यानी पितृ पक्ष में ही यहां के लोग इतनी कमाई कर लेते हैं कि करीब छळ महीने इन्हें सैलानियों की कमी महसूस नहीं होती है। 
होटल पर टंगे नो रूम के बोर्ड
इन दिनों गया में लगभग सभी होटल के बाहर एक तख्ती लटकी नजर आयेगी, उस पर लिखा होगा ‘‘यहां डिस्काउंट बन्द है’’ इन दिनों यहां आसानी से न होटल में रूम मिलेंगे, और न ही धर्मशालाओं में जगह, सभी छोटे-बडे होटलों के रिसेप्शन पर रूम खाली नहीं है के बोर्ड लटके मिलेंगे। हालांकि कमाई को देखते हुए कुछ होटलों में एकस्ट्रा चार्ज के साथ अतिरिक्त बेड की व्यवस्था कर देते है। कई लोग तो अपने घरों को ही 17 दिनों के लिये लाखों रूपये देकर किराये पर ले लेते हें आफर फिर इन्हें प्रत्येक दिन के हिसाब से लोगों को ठहरने के लिये दे देते है। 
वर्षभर रहता है 17 दिनोें का इंतजार
ऐसा इसलिये क्योंकि यह गया में सबसे बड़े त्यौहार का समय है जी हां पितृपक्ष में देश    के हिन्दुओं  में हर कही शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं वहीं गया इसे त्योहार की जैसा मनाता है। यहां के लोग वर्ष भर इन दिनों का इंतजार करते हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह है-व्यापार, छोटी सी दुकान चलाने वाले से लेकर बड़े होटलों वाले हों या ठेके पर सामान बेचने वाले, सबको इस समय का इंतजार होता है इस दौरान बेरोजगार भी छोटा-मोटा सामान बेचकर अच्छी कमाई कर लेते है। पितृपक्ष के बीच 150 से 200 करोड़ रूपये तक का कारोबार होता इस दौरान देश दुनिया से लगभग  5 लाख लोग यहां आते हैै। 
सबसे ज्यादा यह बिकते हैं यह सामान
इन दिनों शहर भी साफ सुथरा हो जाता है, सडकों की मरम्मत  से लेकर बिजली पानी, ड्रेनेज सारे इंतजाम चाक चौबंद होते है। पितरों के उद्वार के लिये होने वाले कर्मकांड  में जौ का आटा, कालातिल, पूजा की अन्य सामग्री कुश, पीतल, फूल, स्टील, मिट्टी के बर्तन, धोती, साड़ी, तौलिया, फल, मिष्ठान, अगरबत्ती, घी, धूप आदि का उपयोग किया जाता है। सबसे ज्यादा बिक्री इन्हीं सामान की होती हैं हर दो कदम पर इनकी दुकानें सजी होती हैं डेढ सौ से ज्यादा गुमटी, ठेले, दुकानें, होने के बावजूद सभी पर भीड़ दिखाई देती है। कोलकाता से फूल का मार्केट भी बढ़ जाता है। 
कई वजह से जाना जाता है गया को
मोक्ष की गली गयाजी से निकलती है, इस पर शहर की और भी कई पहचान है, इसी शहर ने गायकी की दुनिया को गुलाबबाई दी, जद्दनबाई भी गया में आकर रहीं है, इसी शहर से सटा ईश्वरीपुर गांव है जिसे कलाकारों का गांव कहा जाता है। पास पथरकट्टरी गांव है, जहां पत्थर को तराशकर मूर्तियां बनाने वाले लोग रहते हें पास ही कनेर है। पीतर के कारोबार के लिये प्रसिद्ध मानपुर भी है, कभी इसकी तुलना मैनचेस्टर से होती थी, मानपुर में ही पटवा टोली है, वहीं पटवा टोली जहां से हर साल ढेरों आईआईटीन निकलते है।  

 

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